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अपनों के जख्म

"alfaaz mere"
alfaazmere
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हाँ, नदी किनारे वो उसी घर में रहते हैं,
अभी यार बाहर हूँ, हमेशा यही कहते हैं।

शायद जिन्दगी ने उनपर ढाह दिया हैं क़हर,
सिर्फ काम ही काम, हो दिन रात दोपहर।

लगता हैं किसी अपने ने, जख्म दिये हैं घने,
गरौं से ज्यादा, घातक साबित हुए अपने।

हाँ, तन्हा रहकर, स्वयं को मजबूत कर रहे,
अंदर ही घुट घुटकर, अपनो के जख्म सहे।

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डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं, जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।



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