गरीबों के घर खुशहाली के दीप लेकर पहुंचते हैं नालंदा के कृष्ण प्रसाद

बिहारशरीफ। कृष्ण प्रसाद के पास गरीबी में जीवन बिताने के कई अनुभव हैं। खुद का जीवन संवारने के साथ उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे लोगों को गरीबी के चंगुल से निकालें जो बुजुर्ग और लाचार हैं। उन्होंने ऐसे बुजुर्गों के लिए अपने मित्रों से मिलने वाले सहयोग से कोष बनाया है।

JagranPublish: Sat, 22 Jan 2022 11:18 PM (IST)Updated: Sat, 22 Jan 2022 11:21 PM (IST)
गरीबों के घर खुशहाली के दीप लेकर पहुंचते हैं नालंदा के कृष्ण प्रसाद

बिहारशरीफ। कृष्ण प्रसाद के पास गरीबी में जीवन बिताने के कई अनुभव हैं। खुद का जीवन संवारने के साथ उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे लोगों को गरीबी के चंगुल से निकालें जो बुजुर्ग और लाचार हैं। उन्होंने ऐसे बुजुर्गों के लिए अपने मित्रों से मिलने वाले सहयोग से कोष बनाया है। इससे 15 ऐसे लोगों को हर माह खर्च के तौर पर न्यूनतम रकम दी जा रही है जिन्हें परिवार मदद नहीं कर पाता। रकम बुजुर्गों की जरूरत के अनुसार तय होती है। किसी को एक हजार तो किसी को पांच सौ रुपए अंशदान के तौर पर दिए जाते हैं। वार्ड 45 पहाड़पुरा के रहने वाले राघो महतो को हर महीने एक हजार रुपए मिल रहे हैं। वार्ड 46 के घुटर पासवान को इतनी राशि मिल रही है कि वे मूल आवश्यकताएं पूरी कर सकें।

वार्ड 46 झींगनगर निवासी कृष्ण प्रसाद बताते हैं कि गरीब परिवार में जन्म लिया। बचपन से विपन्नता देखी। बावजूद इसके पढ़ने की ललक कम नहीं हुई। उनकी इसी ललक ने उन्हें अधिवक्ता बना डाला। पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कई वर्षों तक पटना की गलियों में रिक्शा चलाया तो कई रसूखदारों के यहां रसोइया का काम किया। पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए सार्वजनिक नालियां साफ करने तक से परहेज नहीं किया। 1981 में तब सुर्खियों में आएं जब मोहल्ले के 150 गरीब बुजुर्गों को अपने खर्च पर फार्म भरवाकर वृद्धा पेंशन दिलाई।

कोई न रहे बेरोजगार : कोरोना के दौरान जब लोग महानगरों को छोड़ घर लौटे तो उनके पास सिर्फ बेरोजगारी थी। उन्होंने गरीब युवकों को रोजगार देने की ठानी। सब्जी बाजार के रहने वाले विजय स्वर्णकार को लोन पर गन्ना पेराई मशीन दिलाई। आज उनका परिवार खुशहाल है। झींगनगर संगत के रहने वाले कारू भी लोन से गन्ने की मशीन लेकर परिवार पाल रहे हैं। वहीं विजय ठेला तो राजू अंडे की दुकान चला रहे हैं। कई निर्धन छात्रों को अपने दम पर वकालत की पढ़ाई करवाई।

बनाना चाहते हैं वृद्धाश्रम :

कृष्ण प्रसाद का सपना एक विशाल वृद्धा आश्रम बनाने का है। इसके लिए वे जमीन की तलाश कर रहे हैं। कहते हैं गरीबों तथा बुजुर्गों की सेवा से उन्हें काफी सुकून मिलता है। उनके घर के दरवाजे गरीबों तथा जरुतमंदों के लिए सदैव खुले हैं। उन्होंने अपने जीवन में गरीबी को काफी करीब से देखा है। गरीब होने का दर्द वे समझते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके रहते कोई गरीबी का दंश झेले। उनके लिए गरीबों की सेवा ही सब कुछ है।

Edited By Jagran

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