संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला शोध संस्थान पांडुलिपि संरक्षण में नहीं दिखा रही रुचि

Darbhanga News शिक्षा विभाग के निर्देश का किया जा रहा उल्लंघन इंटैक अब इन दोनों संस्थानों को पांडुलिपि संरक्षण के लिए नहीं करेगी मदद अबतक छह हजार फोलियो का संरक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है ।

Dharmendra Kumar SinghPublish: Mon, 17 Jan 2022 04:43 PM (IST)Updated: Mon, 17 Jan 2022 04:43 PM (IST)
संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला शोध संस्थान पांडुलिपि संरक्षण में नहीं दिखा रही रुचि

दरभंगा, जासं। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला शोध संस्थान में सुरक्षित पांडुलिपियों के संरक्षण को लेकर शिक्षा विभाग के द्वारा जारी आदेश के बाद भी संस्था अभिरुचि नहीं ले रही है। महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में चल रहे पांडुलिपि संरक्षण कार्य की समीक्षा को पहुंचे बिहार स्टेट चैप्टर के सह- समन्वयक भैरव लाल दास ने कहा कि बिहार सरकार के स्पष्ट निर्देश के बावजूद कामेश्वर ङ्क्षसह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय एवं मिथिला शोध संस्थान द्वारा पांडुलिपियों के संरक्षण कार्य में अभिरुचि नहीं लेना दुर्भाग्यपूर्ण है। 25 अक्टूबर 2021 को शिक्षा विभाग द्वारा उक्त दोनों संस्थानों को निर्देशित किया गया था कि संस्थान की पांडुलिपियों के संरक्षण को इंटैक के दल का सहयोग किया जाय।

इंटैक के बिहार स्टेट चैप्टर के कनवेनर प्रेम शरण ने संस्थान को 10 दिसंबर 2021 को पत्र लिखकर आग्रह किया गया था कि पांडुलिपि संरक्षण के लिए तिथि निर्धारित की जाए ताकि इंटैक के विशेषज्ञों को इस कार्य के लिए भेजा जा सकेगा। लेकिन माह बीत जाने के बाद भी उक्त संस्थानों द्वारा इस दिशा में कोई अभिरुचि नहीं दिखाई गई है।

अब पंजी के संरक्षण में ही खर्च होंगे आवंटित राशि

संग्रहालयाध्यक्ष डा. शिव कुमार मिश्र ने कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला शोध संस्थान द्वारा संरक्षण कार्य में सहयोग नहीं करने के कारण अब संरक्षण के निमित्त आबंटित पूरी राशि पंजी के संरक्षण पर ही खर्च की जाएगी। अबतक छह हजार फोलियो का संरक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है। इसमें ब्राह्मण पंजियार प्रो. जयानंद मिश्र एवं कर्ण कायस्थ पंजियार संजीव प्रभाकर के पंजी के अतिरिक्त महामहोपाध्याय डा. सर गंगा नाथ झा के हस्तलेख तथा वरिष्ठ इतिहासकार डा. अवनींद्र कुमार झा के पूर्वजों के हस्तलेख भी शामिल हैं।

त्रेता युग से ही मिथिला मे पंजी का प्रचलन

पंजियार प्रो. जयानंद मिश्र ने कहा कि त्रेता युग से ही मिथिला में पंजी का प्रचलन था। जिसे कर्णाटवंशी राजा हरिङ्क्षसह देव के समय में लिपिबद्ध किया जाना प्रारंभ किया गया। मिथिला की अधिकतर पुरानी पंजी क्षतिग्रस्त हो चुकी है। शेष मिथिला की दुर्लभ धरोहर है, इसे संरक्षित कराया जाना अत्यंत आवश्यक है। कहा कि धरोहर संरक्षण के प्रति उदासीनता ठीक नहीं है। संस्थानों को पांडुलिपि संरक्षण के प्रति गंभीरता दिखानी होगी। मौके पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वरिष्ठ पदाधिकारी डा. जलज कुमार तिवारी, पूर्व प्रशासनिक पदाधिकारी हेमंत कुमार दास, डा. अयूब राईन, तालाब बचाओ अभियान के समन्वयक नारायणजी चौधरी, मूर्ति विशेषज्ञ डा. सुशांत कुमार, चंद्रप्रकाश, रत्नेश वर्मा, इन्टैक के कंजर्वेटर विनोद तिवारी एवं निसात आलम ,ब्रजेंद्र मिश्र, दिवाकर ङ्क्षसह,पूर्णिमा कुमारी भी मौजूद थीं।

Edited By Dharmendra Kumar Singh

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