अमेरिका में आर्थिक मंदी के दौर की आहट, अर्थशास्त्रियों की बढ़ी चिंता

Sat, 20 May 2017 07:46 PM (IST)

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]: अमेरिका में आयी आर्थिक मंदी की सुनामी के करीब एक दशक बाद फिर उसकी आहट को लेकर चिंता बढ़ गयी। कई हलकों में इसे लेकर चर्चा आम हो चली है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि वर्ष 2008 में जब अमेरिका आर्थिक मंदी की चपेट में फंसा था उस वक्त उसका कुल घरेलू कर्ज अपने उच्चतम बिंदू 12.73 ट्रिलियन डॉलर पर था। कुछ वैसी ही स्थिति दोबारा लौटी है।

पहली तिमाही में 12.7 ट्रिलियन डॉलर घरेलू कर्ज

फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयार्क की वर्ष 2017 की पहली तिमाही रिपोर्ट के मुताबिक कुल घरेलू कर्ज 12.7 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया। एक वर्ष में इसमें 473 बिलयन डॉलर का भारी उछाल आया था। इससे पहले वर्ष 2007-09 अमेरिका के लिए भारी आर्थिक मंदी का वक्त था। हालांकि वर्ष 2008 से वर्ष 2013 के दरम्यान घरेलू कर्ज में गिरावट हुयी। लेकिन वर्ष 2013 में फिर से उसमें बढ़ोत्तरी देखी गयी, जो कि अब उच्चतम बिंदु पर पहुंच गयी है। ऐसी स्थित में अमेरिका फिर से मंदी वाले दौर की आहट सुनाई दे रही है।

अमेरिका में फिर मंदी की आहट

अमेरिका वर्ष 2008 में मंदी के दौर में ऐसा फंसा था कि उससे उबरने में उसे दशकों लग गए। अमेरिका की इस मंदी का असर यूरोप समेत एशियाई देशों पर भी पड़ा। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयार्क के मुताबिक मंदी के दौर में अमेरिकावासियों ने अपने क्रेडिट में सुधार किया, जिससे कि वो लोन ले सके। उनके इस प्रयास से अर्थवयवस्था को खासा लाभ हुआ। अमेरिका के ताजा लोन के ट्रेड में स्टूडेंट लोन सबसे उच्च पायदान पर है, जो कि अर्थव्यवस्था के लिए बोझ बन रहा है। अमेरिकियों की ओर से स्टूडेंट्स लोन, ऑटो लोन और क्रेडिट कार्ड लेने की वजह से अर्थव्यवस्था दोबारा से गर्त में जाती दिख रही है। डिफाल्टरों की लिस्ट लंबी होती जा रही है।

अर्थशास्त्रियों ने कहा- ख़तरे की बात नहीं

हालांकि, आर्थिक मामलों की जानकार राधिका का मानना है कि 2008 में अमेरिका में जो मंदी आई थी उसकी मुख्य वजह बैंक की गलत क्रेडिट पॉलिसी थी। उनका मानना है कि उस वक्त रिएल एस्टेट में गलत तरीके से पैसा लगा दिया गया था। बैंक ने गलत जगहों पर लोन दे दिया था। जिसकी वजह से वित्तीय संकट पैदा हुआ था। लेकिन, इस बार स्थिति पहले की तुलना में इतनी खराब नहीं है।

राधिका ने कहा कि पिछली बार भारत में अमेरिकी मंदी का इसलिए ज्यादा असर हुआ क्योंकि अमेरिका के साथ काफी ज्यादा ट्रेड था लेकिन अब वह ट्रेड किसी एक देश में केन्द्रित ना होकर चौतरफा है। ऐसे में अगर अमेरिका में मंदी आती भी है तो उसका भारत पर बहुत ज्यादा असर नहीं होगा।

जबकि, आर्थिक जानकार शंकर अय्यर मानते हैं कि अमेरिका में मंदी अगर आती है तो उसकी मुख्य वजह होगी राजनीतिक अनिश्चितता। उनका कहना है कि आज जहां अमेरिका और उत्तरी कोरिया की स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है तो वहीं सीरिया मामले में वह रुस के आमने-सामने खड़ा है। ऐसे में अमेरिका में मंदी का कारण वहां पर मचे उथल पुथल हो सकता है।

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अर्थशास्त्री हेडर बोशे के मुताबिक कर्ज के ताजा ट्रेंड कोई बेंचमार्क नहीं हैं, जहां से वापस जाने के लिए हमें परेशान होना चाहिए। ज्यादा कर्ज लेना आशावादी संकेत हैं। वास्तविकता में परिवार कर्ज को एक तंत्र की तरह उपयोग में लाते हैं, जहां अपनी आय से आगे बढ़कर चीजों को खरीदते हैं और कर्ज का उपयोग करते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी कुल घरेलू कर्ज बढ़ रहा था। कर्ज के आंकड़े बढ़ोत्तरी की ओर थे। वर्ष 2008 में कुल घरेलू कर्ज में गिरावट का दौर शुरु हुआ, जो कि 19 तिमाही तक जारी रहा। यह दौर था जब लोगों ने उधारी से दूरी बना ली थी। हालांकि कुल कर्ज ने दोबारा से 2013 में रफ्तार पकड़ी और अपने उच्चतम बिंदु पर जा पुहंचा।

यहां यह विश्वास करने की वजह है कि कर्जदारों को वित्तीय संकट के दौरान बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम होना आना चाहिए। अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है, जब देश का ऋण भार एक क्षण में नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहा है ऐसे में अर्थशास्त्रियों के लिए ज्यादा चिंता की बात नहीं है। आज के दौर में अमेरिका में पहले की तुलना में कर्ज लेने में अंतर आया है। स्टूडेंट लोन महंगी शिक्षा व्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है। वर्ष 2008 में कुल घरेलू खर्ज का आठ फीसदी रहने वाले स्टूडेंट लोन अब 11 फीसदी की दहलीज पर पहुंच गया है।

आंकड़ों के मुताबिक स्टूडेंटस की ओर से लिया जाने वाले लोन की कीमत 1.3 ट्रिलियन डॉलर है, जो कि नौ वर्ष पहले करीब 611 बिलियन डॉलर था। न्यूयार्क फेड की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दशकों में लीड पर रहने वाला ऑटो सेक्टर के कर्ज लेने की गति में गिरावट हुयी है। कुल आटो लोन 1.1 ट्रिलियन डॉलर रहा, जो कि पहली तिमाही के उपभोक्ता कर्ज का नौ फीसदी है।

न्यूयार्क फेड की रिपोर्ट के मुताबिक स्टूडेंट लोन लेने वालों 10 छात्रों में एक कर्ज की अदायगी कर रहा है, जिसकी वजह से कर्ज बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक में अमेरिका में कालेज डिग्री के लिए ज्यादा कर्ज चुकाया जाता हैं। लेकिन मार्केट में वेतन की धीमी वृद्धि की वजह से वो कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं।

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