नई राजनीतिक जमीन बनाने की कवायद का हिस्‍सा है गोरखालैंड की मांग

Mon, 19 Jun 2017 07:11 PM (IST)

रमेश ठाकुर

दार्जिलिंग में पिछले दिनों संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत ने गोरखा समुदाय की जमीन दरकने के संकेत दिए थे। तभी से गोरखा मुक्ति मोर्चे की बेचैनी बढ़ी हुई है। इसलिए अपनी जमीन को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। गोरखा समुदाय इस समय उग्र है। हालांकि उनकी अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। गोरखालैंड के लिए आंदोलित हो रहे लोग कहते हैं कि देश के दूसरे हिस्सों में लोगों ने अलग राज्य की मांगें की थी उनकी मांगे पूरी करके अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया है। तेलंगाना ताजा उदाहरण है। तो गोरखालैंड को क्यों नहीं अलग किया जा रहा। आंदोलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। दुकानों के शटर गिरा दिए गए हैं।

 

पूरे दार्जिलिंग में हालात बेकाबू हो गए हैं। जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख बिमल गुरुंग का मौजूदा आंदोलन भी किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से कम नहीं है। लेकिन उनकी इस मांग ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। इस संकट से पर्यटन के इस व्यवसाय पर भी बहुत असर पड़ रहा है। गर्मी के मौसम मे लोग दार्जिलिंग घूमने जाते हैं लेकिन उनके उपद्रव ने गर्मी में ठंड का एहसास कराने वाले इस हिल स्टेशन ने गर्मी का महसूस करा दिया है। इससे सरकार को पर्यटन से होनी वाली आय से करोड़ों का नुकसान हुआ है।

आग कब शांत होगी, इसकी संभावना भी नहीं दिखाई देती। देखा जाए तो पश्चिम बंगाल के इस गोरखा बहुल इलाके में गोरखालैंड आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है। मगर इस बार जिस तरह भाषायी मुद्दे को तूल देकर आंदोलन ने जोर पकड़ा है, यह चिंता की बात है। केंद्र सरकार इसमें ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर रही है। भाजपा का झुकाव काफी हद तक गोरखाओं के प्रति दिखाई दे रहा है। भाजपा ऐसा इसलिए कर रही है क्योंकि इस आंदोलन की आड़ में वह अपना विस्तार कर सकेगी। इस बात से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खासी चिंतित हैं। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने बंगाली अस्मिता के मुद्दे को हवा देने के मकसद से पहली कक्षा से बांग्ला भाषा की अनिवार्यता की घोषणा की थी।

जिसे मुद्दा बनाकर नेपाली भाषी इलाकों में आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हुई। हालांकि, बाद में ममता बनर्जी ने कह भी दिया कि यह अनिवार्यता गोरखा बहुल इलाके पर नहीं लागू होगी। मगर तब तक मुद्दा गरमा गया था। तीर कमान से निकल चुका था और शतरंज की बिसातें बिछ चुकी थीं। कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में नई जमीन तलाशने में लगी भाजपा के साथ गोरखा जनमुक्ति मोर्चे का तालमेल कर रहा है। यदि वाकई इस आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। यह नहीं भूल जाना चाहिए कि गोरखालैंड की अस्मिता पड़ोसी देश से जुड़ती है, जहां चीन तरह-तरह के खेल, खेल रहा है। गोरखा आंदोलन जानबूझकर ऐसे समय में शुरू किया गया है जब सरकार को सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से नुकसान हो।

दार्जिलिंग के तीन गोरखा बहुल जिलों में यह आंदोलन ऐसे समय में फूटा है जब पर्यटकों का पीक सीजन होता है। कमोबेश चाय बागानों के लिए भी यह महत्वपूर्ण समय होता है। आंदोलन का दूसरा पहलू भी बाहर निकलकर आ रहा है। गोरखालैंड आंदोलन को केंद्र में सत्तारूढ़ दलों द्वारा विपक्ष की पश्चिम बंगाल सरकार को परेशान करने के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं। सुभाष घीसिंग को केंद्र की कांग्रेस सरकार द्वारा वामपंथी सरकार पर नकेल डालने के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगे हैं।

इस बार राजग सरकार की तरफ उंगली उठ रही है। इसका आधार यह भी है कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चे का भाजपा के साथ चुनावी तालमेल रहा है। ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के बाद आंदोलनकारियों से समझौता करके गोरखालैंड स्वायत्तशासी संस्था जीटीए का गठन किया गया था। जीजेएम के संस्थापक बिमल गुरंग इसके मुख्य अधिशासी बने थे। इसके अलावा 45 सदस्यीय जीटीए के चुनाव इस वर्ष होने हैं। पिछले दिनों स्थानीय निकाय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत ने गोरखा मुक्ति मोर्चे की बेचौनी बढ़ा दी है। वैसे भी दरकती जमीन को संभालने के लिए उसे कुछ तो करना ही था। सो मौका मिलते ही उसने आंदोलन को हवा दे दी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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